Beti par kavita । हक देती नहीं मैं

Beti par kavita

Beti par kavita in hindi

बेटी पर कविता

हक देती नहीं मैं उन्हें जो कहते हैं,
बेटी पराया धन होती है।
आज भी हमारे देश में बेटी कि तुलना
क्या बेटों से कम होती है?

समझ नहीं आता मुझे क्यों कहते हैं
बात बेटी को बचाने की,
इतिहास गवाह है मेरे अस्तित्व का,
जरूरत है तो आज
अपने बेटों को समझाने की।

क्यों अनजाने लोग भी
बेवजह मेरी फिक्र करते हैं?
क्यों एक लड़की के रात में बाहर
निकलने पर घर वाले डरते हैं ?
क्या मुझे आजाद रहने की इजाजत नहीं,
पर यह भी सच है
मुझे पिंजरे में कैद रहने की आदत नहीं।

क्यों बात कही जाए बेटी बचाने की?
इतिहास गवाह है मेरे अस्तित्व का,
जरूरत है तो आज
अपने बेटों को समझाने कि ।

आज घर से निकलते ही मेरे कपड़ों पर
सब के तानों की बौछार आई,
कहने लगे लोग ,तू लड़की है संभल जा
इस घर की नहीं है तू
कल जो दूजे घर होगी तेरी विदाई ।

बात तो सच है कि मैं लड़की हूं ,
पर दुर्गा मैं कल भी थी ,
और आने वाले कल भी हूं ।

क्यों बात कही जाए मुझे बचाने की ,
जरूरत है तो आज अपने बेटों से
मुझे सम्मान दिलाने की।

BETI PAR KAVITA । HAQ DETI NAHI MAIN

haq deti nahi main unhen jo kehte hain,
beti paraaya dhann hoti hai,
aaj bhi humare desh mein beti ki tulna,
kya beton se kumhoti hai?

samajh nahi aata mujhe kyun kehte hain baat,
beti ko bachaane ki,
itihaas gavaah hai mere astitav ka,
jarurat hai toh aaj,
apne beton ko samajhaane ki….

kyun anjaane log bhi,
bevajah meri phikr karte hain?
kyun ek ladki ke raat mein baahar
nikalane par ghar waale darte hain?

kya mujhe azzad rahne ki izzaazat nahi,
par yah bhi sach hai,
mujhe pinjare mein kaid rahne ki aadat nahi….

kyun baat kahi jaye beti bachaane ki?
itihaas gavaah hai mere astitav ka,
jarurat hai toh aaj,
apne beton ko samajhaane ki….

aaj ghar se nikalte hi mere kapadon par,
sab ke taano ki bauchhaar aai,
kehane lage log, tu ladki hai sambhal jaa,
is ghar ki nahi hai tu,
kal jo dooje ghar hogi teri vidai…..

baat to sach hai ki main ladki hun,
par durga main kal bhi thi,
aur aane waale kal bhi hun….

kyun baat kahi jaye mujhe bachaane ki,
jarurat hai toh aaj, apne beton se,
mujhe sammaan dilaane ki.

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