Deshbhakti kavita l मैं सैनिक

Deshbhakti kavita

Deshbhakti kavita in Hindi
Deshbhakti kavita

मैं सैनिक…
तिरंगे में लिपटा हुआ मैं खून से सना,
सरहद में बैठा मैं लड़ता रहा।
तूफान का आंधियों का मंजर मैं सहता रहा,
गोलियां चली बारूदें गिरि ,
मौत ने चारों ओर से घेरे रखा था।

तीर कमान से जैसे निकल गई थी,
युद्ध का शंखनाद अब बज चुका था।
उस अंधेरे में मैं कई लाशें बिछाई,
कुछ लाशें सरहद के इस पार भी थीं।
तिरंगे में लिपटा मैं खून से सना,
भारत मां की गोद में मैं पड़ा रहा।

मुझे अभिमान है इस दृश्य का,
मैं देश की शान में मान से गया।
किसी ने जो छेड़ी जंग,
मैं पूरा खत्म कर गया।
तिरंगे में लिपटा मैं खून से सना,
मेरे हिंदुस्तान का एक और वीर बन गया।

तिरंगे में लिपटा मैं खून से सना ,
मेरी मां के आंसुओं में शान से गया।

DESHBHAKTI KAVITA । MEIN SAINIK
mein sainik..
tirange me lipta huwa mein khoon se sana,
sarhad me baitha mein ladta raha.
toofan ka aandhiiyo ka manzar mein sahta raha,
goliya chli baroode giri,
mout ne charo aur se ghere rakha tha.

teer kaman se jaise nikal chuki thi,
yudh ka sankhnaad ab baj chup tha.
uss andhere me mein kai lashe bichai,
kuch lashe sarhad ke iss par bhi thi.
tirange me lipta mein khoon se sana,
bharat maa ki god me mein pada raha.

mujhe abhiman hai is drishya ka,
mein desh ki shan me maan se gaya.
kisi ne jo chedi jung,
mein pura khatam kar gaya.
tirange mein lipta mein khoon se sana,
mere hindustan ka ek aur veer ban gaya.

tirange me lipta mein khoon se sana,
meri maa ke aashuao me san gaya.

Deshbhakti kavita 👇
deshbhakti poetry l मातृभूमि तुझे शत-शत प्रणाम

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